Category Archives: Civil Rights


PTC News Discussion – Scrap MoU with Monsanto

Discussion on PTC news w.r.t. why Punjab Government must scrap the MoU it has signed with Monsanto. Hemant Goswami and Umendra Dutt argue their case.


Discussion on RTE for 0-6 Year

Discussion about the implication of the judgement of Delhi High COurt w.r.t. Right to Education for children upto 6 years old. Hemant Goswami, Pramod and Ms. Sachdeva discuss it out. Talk show aired by Day and Night News channel.

Haryana Child Right Commission Formed – High Court informed

Child-Right-Panel CHANDIGARH, January 16, 2013:- The Haryana Government today intimated the Punjab and Haryana High Court that they have constituted the “Haryana State Commission for Protection of Child Right,” in compliance to the orders of the High Court in the public interest litigation (PIL) moved by social activist Hemant Goswami. The Punjab Government had already constituted the Punjab Child Rights Commission in compliance to the HC orders. Both Government of Punjab and Haryana intimated the court, by filling affidavits, that they have appointed Chairman and two members in the commission.

The first DB of Chief Justice A.K. Sekri and Justice R.K. Jain of Punjab and Haryana Court directed that in total six members and a chairman are to appointed and so four more members must be appointed by both Punjab and Haryana to make the commission functional.

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Hookah/ Sheesha Bars illegal – High Court

Putting an end to the abuse of Nicotine, thriving across Punjab, Haryana and Chandigarh in the name of serving Hookah/ Sheesha/ Water-Pipe, the Punjab and Haryana High court has ordered closure of all such outlets besides creation of a task force to check the menace in future too.

Acting on a “Public Interest Litigation (PIL)” by the NGO Burning Brain Society and its chairman Hemant Goswami, the Divisional Bench of Chief Justice A. K. Sikri and Justice R. K. Jain disposed off the Writ Petition with the directions to States of Punjab, Haryana and Chandigarh to constitute a permanent task force for monitoring the abuse of Nicotine in chemical form which is being used by Hookah Bars and others. The court also directed to register criminal cases against the violators and take all appropriate steps as required in accordance with the law.

Hemant Goswami, chairman of Burning Brain Society, who appeared and argued the case in person pleaded that various outlets in Chandigarh, Punjab and Haryana were serving Hookah/ Sheesha to youngsters which contained Nicotine which was not only noxious/ hazardous but also fatal. Goswami pointed out that just 30 milligram of Nicotine was sufficient to cause death of a healthy human being in under one minute which is why it was a deadly poison fit to be regulated under the Poisons Act. The Insecticide Act categorised Nicotine as an insecticide and the Hazardous Chemical Rules 1986 also label Nicotine as a hazardous and toxic chemical.

During the course of hearing, over the years, the High court had passed many enabling orders and even constituted a task force, resulting in closure of all Hookah/ Sheesha outlets across Chandigarh, Punjab and Haryana. Punjab, Haryana and Chandigarh also registered many criminal cases against outlets and people trading in Hookah/ Sheesh and the ingredient used in Hookah.

The High Court order, which was reserved for November 5, 2012 and has been made available today holds that, “there is no doubt that many Hukkah bars are serving tobacco molasses containing Nicotine, which is clearly illegal and entails penal consequences.”

Expressing satisfaction, Hemant told, “The case against the mushrooming of Hookah/ Sheesha outlets was filed in the year 2007 and it took five years and nearly 45 hearings to finally put a permanent end to the menace of Nicotine, Hookah and Sheesha outlets in the region.”


Discussion – Facebook censorship; IT Act Amendment and Mumbai’s reaction to Bal Thakrey

Discussion on “Day and Night News” about the reaction of Mumbai to the death of Bal Thakery and the arrest of youngsters in Mumbai for posting Comments relating to Bal Thakery. Hemant Goswami, Prof. Akshay and Prof. Lalan discuss the issue.

5 Years of ‘Right to Information’ Legislation


सूचना का अधिकार और आम आदमीपांच साल के बाद
हेमन्त गोस्वामी


पिछले पांच वर्षों में काफी लोग यह तो जान गए हैं कि सूचना प्राप्त करने का कोई अधिकार है पर ज्यादातर अभी भी नहीं जानते कि सूचना कैसे मिलती है और उसके लिए क्या प्रावधान है। नतीजतन आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर पा रहा है। इसका एक बड़ा कारण है कि सरकार अपने कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं कर रही है। सूचना के अधिकार धिनियम 2005 के अंतर्गत सरकार का यह उत्तरदायित्व था कि वह सूचना अधिकार अधिनियम के बारे में जन साधारण को जागरूक करे। सरकार का यह भी दायित्व था कि जनपद के लिए सूचना प्राप्त करना सुलभ बनाये। सरकार इसमें पूरी तरह से विफल हुई है। ना-कामयाबी का यह आलम है कि सूचना अधिकार विधान के सेक्शन 4(1 ) के सारे प्रावधान आज पांच साल बाद भी क्रियान्वित नहीं हो पाए हैं। सेक्शन 4(1)(), (सी) और (डी) भाग के अनुसार सरकार का फ़र्ज़ है कि हर ज़रुरी दस्तावेज़ बिना किसी के माँगे जनता को उपलब्ध कराये और उसे इन्टरनेट पर भी डाले। यह भी अनिवार्य है की हर वह फैसला जिससे जनता या कोई व्यक्ति या समुदाय विशेष प्रभावित होता हो उसके सारे दस्तावेज़ बिना किसी के माँगे उपलब्ध करवाए और उस फैसला लेने का घटनाक्रम और कारण जनता से सांझा करे। अफ़सोस यह सारे नियम केवल काले अक्षर बन कर किताबों में बंद पड़ें है और इसको लागू करने की सरकार की कोई मंशा नज़र नहीं रही है। बावजूद इसके पिछले पांच साल में भ्रष्टाचार रोकने और उजागर करने में सूचना अधिकार का अहम् योगदान रहा है। 


क्या है सूचना का अधिकार?

सरकार हमारे पैसे से चलती है और समानता से सर्वहित में हमारे पैसे का सदुपयोग करना ही सरकार के अस्तित्व का आधार है। ऐसे में हमारी सरकार चलाने वाले हमारे चुनिंदा लोग अपने कर्त्तव्य से पथ-भ्रष्ट ना हों इसके लिए उनका जनता को जवाबदेही होना जरूरी है। अपने टैक्स के पैसे का हिसाब मांगने और उससे होने वाले काम का ब्योरा जानने का अधिकार हर आम आदमी के पास होना किसी भी सफल गणतंत्र के लिए ज़रूरी है। यह भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगाने का एक आसान उपाय हो सकता है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 इस मंशा से ही लागू हुआ था। इस कानून के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति सरकार के किसी भी विभाग या सरकार के पैसे से चलने वाले किसी भी संस्थान से कोई भी सूचना और दस्तावेज़ प्राप्त कर सकता है।  सूचना के आवेदक को इसके लिए कोई कारण बताने कि आवश्यकता नहीं है। केवल एक साधारण कागज़ पर अपना नाम पता और वांछित जानकारी और दस्तावेज़ों की सूची लिख कर दस रुपये के साथ सम्बंधित विभाग के सूचना अधिकारी को जमा करवानी है। कानून के मुताबिक वह जानकारी और दस्तावेज़ उस व्यक्ति को 30 दिन के भीतर उपलब्ध करवाना उस विभाग के सूचना अधिकारी की ज़िम्मेदारी है। सूचना ना मिलने पर अपील करने का प्रावधान है, जिसके लिए कोई पैसे नहीं लगते और ही किसी वकील की ज़रूरत है। सूचना ना देने कि सूरत में सूचना अधिकारी को 25000 तक का जुर्माना लगाने का नियम है।


कहाँ विफल हुआ है  सूचना का अधिकार?

यद्यपि सरकार की अनुचित गोपनीयता कि नीति के मुकाबले आधा अधूरा सूचना का अधिकार भी बड़ी जीत सा प्रतीत होता है लेकिन सच तो यही है कि सूचना प्राप्त करना आज भी एक लम्बी लड़ाई जैसा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि केवल सरकार के पिट्ठू ही इन्फोर्मेशन कमिशनर  के रूप में नियुक्त होते है। इन्फोर्मेशन कमिशनर कि नियुक्ति में किसी भी तरह की कोई पारदर्शिता नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 और 16 कि सीधी सीधी अवमानना है। ऐसे में वह इन्फोर्मेशन कमिशनर जो सिफारिश और राजनीती कि वजह से नियुक्त हुए है वह अपने सरकारी आकाओं के हक़ में फैसले लेने से नहीं चूकते। इसका एक प्रमाण है कि कई इन्फोर्मेशन कमिशनर आज पांच साल बाद भी दोषी सूचना अधिकारी को जुर्माना लगाने से परहेज़ करते हैं। सरकार सूचना के अधिकार को आम लोगो तक ले जाने में भी बुरी तरह नाकामयाब हुई है। जहाँ सूचना के लिए बने इन्फोर्मेशन कमीशन का फ़र्ज़ था कि सूचना प्राप्त करने कि बाधा को ख़तम करे वहां इन्फोर्मेशन कमीशन ने गैर ज़रूरी नियम और नियमावली बना डाली। नतीजतन आम आदमी के लिए जानकारी प्राप्त करना और भी कठिन हो गया। कानून के तहत गरीब आदमी को सूचना मुफ्त देने का प्रावधान है पर 5 सालों में इसके केवल इक्का दुक्का ही उदाहरण है। न्यायतंत्र भी पारदर्शिता से घबराया हुआ है और अभी तक  न्यायालयों का भी पूरा सहयोग राष्ट्र को नहीं मिल पाया हैं।


कहाँ सफल हुआ है  सूचना का अधिकार?

सूचना के अधिकार ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के हाथ में भ्रष्टाचार से लड़ने में चंडी के हथियार सा काम किया है। अनेक बाधाओं के बावजूद ऐसे कई उदाहरण है जहा आम आदमी सरकार के भ्रष्टाचार और कई गैर कानूनी गतिविधियों का पर्दाफ़ाश करने में कामयाब रहा है। इस वजह से कई बार सरकार अपनी गलत नीतियाँ बदलने पर मजबूर भी हुई है और अनेक मामलों में सीबीआई और CVC भी केस दर्ज करने पर मजबूर हुई है। उदाहरण के लिये रेड क्रोस में भ्रष्टाचार का खुलासा सूचना के अधिकार के प्रयोग से ही हुआ। चंडीगढ़ में कई करोड कि ज़मीन के घोटालों का पर्दाफ़ाश हो या चंडीगढ़ को स्मोक फ्री सिटी बनाने का प्रयोग हो, सब सूचना के अधिकार के कारण ही हुआ है। हजारों ऐसे उदहारण हैं जहाँ लोगो ने अपने साथ हुए अन्याय से लड़ने के लिए सूचना के अधिकार का कामयाबी से प्रयोग किया हे। मामला चाहे अपने डिपार्टमेंट में प्रोमोशन का हो या अपने सहकर्मी द्वारा अपने पद के दुरुपयोग का हो, सरकारी कर्मचारियों ने भी सूचना के अधिकार का खूब सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। इसमें कोई शक नहीं है कि सोते हुए अफसरों को जगाने के लिए सूचना का अधिकार एक कारगर उपकरण साबित हुआ है।


यहाँ से आगे का सफ़र

भ्रष्ट अधिकारी सूचना के अधिकार के प्रयोग से विचलित हैं। वह हर संभव कोशिश कर रहें हैं जिससे इस अधिनियम में बदलाव लाया जा सके। ज़ाहिर है कि जो भी व्यक्ति सूचना छुपाने का काम करता है उसके भ्रष्टाचार में लिप्त  होने की पूरी सम्भावना है।  सहजतः पारदर्शिता जनहित में हैं और गोपनीयता भ्रष्ट अधिकारियों के हित मैं है। ऐसे में हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह सतर्क रहे और सूचना के अधिकार को कमज़ोर करने के किसी भी प्रयास को सफल होने दे।  सूचना का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19  में दिए अभिव्यक्ति के अधिकार का ही हिस्सा है और इसके पूर्ण रूप से लागू होना केवल जनहित मैं है बल्कि यह हमारे राष्ट्र और संविधान को सबल और सशक्त बनाने का मार्ग भी सुगम करेगा। रास्ता कठिन और कंटकमय ज़रूर है पर  दिशा सही नज़र रही है।
हेमन्त गोस्वामी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और कई गैर सरकारी संस्थानों से जुड़े हुए हैं आप हेमन्त से ई-मेल पर संपर्क कर सकते है


Independence – What are we celebrating

independence-indiaSo we are going to celebrate Independence of India? The republic India? A country enslaved in the shackles of corruption, communalism, castism, nepotism, crime, with disregard for human life & dignity.

Is there any reason to celebrate when there’s total lawlessness everywhere, corruption is rampant, number of poor people have increased many folds, the gap between the rich and the poor is widening everyday and what not. The very values enshrined in the constitution and envisioned in independent India are now no one’s concern. Even those who sit in the high offices by virtue of the power given by the constitution are not concerned about that very constitution.

Every Bureaucrat is a law onto himself, what to say even the peon of the bada sahib is so empowered. Who cares about the law, everyone talks about the so called practical aspect and the precedents as if the laws are just comic books and fictitious novels and they have the right to decide so. Even the judges in the court “on record” say that there is a law of the books and a law of practice. God knows who made this law of practice outside the spirit of the constitution, how one can come to know about it and how it is to be followed. This creates a situation where all laws are interpreted selectively in an aristocratic manner under the golden umbrella and with the blessings of Maa Lakshmi.

The ears of the blind God of Justice are too high and takes years for any voice to reach there undistorted. The People are too afraid to demand their rights or even raise their voice. A ten to twenty year period for a court case to finish is but a very small period. Speedy trial is not a right even in the fast track courts.

The statistics are manipulated year after year to show progress. People like us, living in urban areas, are made to believe that the whole country is progressing. Statistics are quoted, increase in GDP is cited and what not. We are made to believe that India is growing rich.

There are just around 6 crores and 40 lakh gas cylinders in India, what to speak of any other thing. How is the rest of India cooking its food? Still using Kerosene and Wood (or do you believe they are using microwaves?). Half of the countries population stills sleeps without three meals a day.

Even the poorest of Indian pay over 30% on all money transacted through him in the form of Sales Tax, Excise, Service Tax, Property Tax, Octroi, Income Tax, etc. Since every article we buy is directly and indirectly taxed at many levels so even if not everyone is paying Income Tax still he/she is paying good amount of taxes. Where is it going? Why no development is still taking place?

How have we killed the spirit of independence of every Indian? No one can dare raise his voice against corruption, crime or any other wrong. Any one can come and rob, kill or rape in broad daylight, in presence of hundreds of people, still no one raises his/her voice.

In 58 years we have managed to developed a system which has chocked every voice capable of speaking, handicapped every mind which can think, killed the spirit of enquiry or inquisitiveness and moved from a Nation of action to nation of rhetoric’s. As if all the speeches (and the so called planning’s) is a substitute to action.

What are we celebrating?

Still deliberating…………..
Hemant Goswami