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5 Years of ‘Right to Information’ Legislation

 

सूचना का अधिकार और आम आदमीपांच साल के बाद
हेमन्त गोस्वामी

 

पिछले पांच वर्षों में काफी लोग यह तो जान गए हैं कि सूचना प्राप्त करने का कोई अधिकार है पर ज्यादातर अभी भी नहीं जानते कि सूचना कैसे मिलती है और उसके लिए क्या प्रावधान है। नतीजतन आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर पा रहा है। इसका एक बड़ा कारण है कि सरकार अपने कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं कर रही है। सूचना के अधिकार धिनियम 2005 के अंतर्गत सरकार का यह उत्तरदायित्व था कि वह सूचना अधिकार अधिनियम के बारे में जन साधारण को जागरूक करे। सरकार का यह भी दायित्व था कि जनपद के लिए सूचना प्राप्त करना सुलभ बनाये। सरकार इसमें पूरी तरह से विफल हुई है। ना-कामयाबी का यह आलम है कि सूचना अधिकार विधान के सेक्शन 4(1 ) के सारे प्रावधान आज पांच साल बाद भी क्रियान्वित नहीं हो पाए हैं। सेक्शन 4(1)(), (सी) और (डी) भाग के अनुसार सरकार का फ़र्ज़ है कि हर ज़रुरी दस्तावेज़ बिना किसी के माँगे जनता को उपलब्ध कराये और उसे इन्टरनेट पर भी डाले। यह भी अनिवार्य है की हर वह फैसला जिससे जनता या कोई व्यक्ति या समुदाय विशेष प्रभावित होता हो उसके सारे दस्तावेज़ बिना किसी के माँगे उपलब्ध करवाए और उस फैसला लेने का घटनाक्रम और कारण जनता से सांझा करे। अफ़सोस यह सारे नियम केवल काले अक्षर बन कर किताबों में बंद पड़ें है और इसको लागू करने की सरकार की कोई मंशा नज़र नहीं रही है। बावजूद इसके पिछले पांच साल में भ्रष्टाचार रोकने और उजागर करने में सूचना अधिकार का अहम् योगदान रहा है। 

 

क्या है सूचना का अधिकार?

सरकार हमारे पैसे से चलती है और समानता से सर्वहित में हमारे पैसे का सदुपयोग करना ही सरकार के अस्तित्व का आधार है। ऐसे में हमारी सरकार चलाने वाले हमारे चुनिंदा लोग अपने कर्त्तव्य से पथ-भ्रष्ट ना हों इसके लिए उनका जनता को जवाबदेही होना जरूरी है। अपने टैक्स के पैसे का हिसाब मांगने और उससे होने वाले काम का ब्योरा जानने का अधिकार हर आम आदमी के पास होना किसी भी सफल गणतंत्र के लिए ज़रूरी है। यह भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगाने का एक आसान उपाय हो सकता है। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 इस मंशा से ही लागू हुआ था। इस कानून के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति सरकार के किसी भी विभाग या सरकार के पैसे से चलने वाले किसी भी संस्थान से कोई भी सूचना और दस्तावेज़ प्राप्त कर सकता है।  सूचना के आवेदक को इसके लिए कोई कारण बताने कि आवश्यकता नहीं है। केवल एक साधारण कागज़ पर अपना नाम पता और वांछित जानकारी और दस्तावेज़ों की सूची लिख कर दस रुपये के साथ सम्बंधित विभाग के सूचना अधिकारी को जमा करवानी है। कानून के मुताबिक वह जानकारी और दस्तावेज़ उस व्यक्ति को 30 दिन के भीतर उपलब्ध करवाना उस विभाग के सूचना अधिकारी की ज़िम्मेदारी है। सूचना ना मिलने पर अपील करने का प्रावधान है, जिसके लिए कोई पैसे नहीं लगते और ही किसी वकील की ज़रूरत है। सूचना ना देने कि सूरत में सूचना अधिकारी को 25000 तक का जुर्माना लगाने का नियम है।

 

कहाँ विफल हुआ है  सूचना का अधिकार?

यद्यपि सरकार की अनुचित गोपनीयता कि नीति के मुकाबले आधा अधूरा सूचना का अधिकार भी बड़ी जीत सा प्रतीत होता है लेकिन सच तो यही है कि सूचना प्राप्त करना आज भी एक लम्बी लड़ाई जैसा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि केवल सरकार के पिट्ठू ही इन्फोर्मेशन कमिशनर  के रूप में नियुक्त होते है। इन्फोर्मेशन कमिशनर कि नियुक्ति में किसी भी तरह की कोई पारदर्शिता नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 और 16 कि सीधी सीधी अवमानना है। ऐसे में वह इन्फोर्मेशन कमिशनर जो सिफारिश और राजनीती कि वजह से नियुक्त हुए है वह अपने सरकारी आकाओं के हक़ में फैसले लेने से नहीं चूकते। इसका एक प्रमाण है कि कई इन्फोर्मेशन कमिशनर आज पांच साल बाद भी दोषी सूचना अधिकारी को जुर्माना लगाने से परहेज़ करते हैं। सरकार सूचना के अधिकार को आम लोगो तक ले जाने में भी बुरी तरह नाकामयाब हुई है। जहाँ सूचना के लिए बने इन्फोर्मेशन कमीशन का फ़र्ज़ था कि सूचना प्राप्त करने कि बाधा को ख़तम करे वहां इन्फोर्मेशन कमीशन ने गैर ज़रूरी नियम और नियमावली बना डाली। नतीजतन आम आदमी के लिए जानकारी प्राप्त करना और भी कठिन हो गया। कानून के तहत गरीब आदमी को सूचना मुफ्त देने का प्रावधान है पर 5 सालों में इसके केवल इक्का दुक्का ही उदाहरण है। न्यायतंत्र भी पारदर्शिता से घबराया हुआ है और अभी तक  न्यायालयों का भी पूरा सहयोग राष्ट्र को नहीं मिल पाया हैं।

 

कहाँ सफल हुआ है  सूचना का अधिकार?

सूचना के अधिकार ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के हाथ में भ्रष्टाचार से लड़ने में चंडी के हथियार सा काम किया है। अनेक बाधाओं के बावजूद ऐसे कई उदाहरण है जहा आम आदमी सरकार के भ्रष्टाचार और कई गैर कानूनी गतिविधियों का पर्दाफ़ाश करने में कामयाब रहा है। इस वजह से कई बार सरकार अपनी गलत नीतियाँ बदलने पर मजबूर भी हुई है और अनेक मामलों में सीबीआई और CVC भी केस दर्ज करने पर मजबूर हुई है। उदाहरण के लिये रेड क्रोस में भ्रष्टाचार का खुलासा सूचना के अधिकार के प्रयोग से ही हुआ। चंडीगढ़ में कई करोड कि ज़मीन के घोटालों का पर्दाफ़ाश हो या चंडीगढ़ को स्मोक फ्री सिटी बनाने का प्रयोग हो, सब सूचना के अधिकार के कारण ही हुआ है। हजारों ऐसे उदहारण हैं जहाँ लोगो ने अपने साथ हुए अन्याय से लड़ने के लिए सूचना के अधिकार का कामयाबी से प्रयोग किया हे। मामला चाहे अपने डिपार्टमेंट में प्रोमोशन का हो या अपने सहकर्मी द्वारा अपने पद के दुरुपयोग का हो, सरकारी कर्मचारियों ने भी सूचना के अधिकार का खूब सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। इसमें कोई शक नहीं है कि सोते हुए अफसरों को जगाने के लिए सूचना का अधिकार एक कारगर उपकरण साबित हुआ है।

 

यहाँ से आगे का सफ़र

भ्रष्ट अधिकारी सूचना के अधिकार के प्रयोग से विचलित हैं। वह हर संभव कोशिश कर रहें हैं जिससे इस अधिनियम में बदलाव लाया जा सके। ज़ाहिर है कि जो भी व्यक्ति सूचना छुपाने का काम करता है उसके भ्रष्टाचार में लिप्त  होने की पूरी सम्भावना है।  सहजतः पारदर्शिता जनहित में हैं और गोपनीयता भ्रष्ट अधिकारियों के हित मैं है। ऐसे में हर नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह सतर्क रहे और सूचना के अधिकार को कमज़ोर करने के किसी भी प्रयास को सफल होने दे।  सूचना का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19  में दिए अभिव्यक्ति के अधिकार का ही हिस्सा है और इसके पूर्ण रूप से लागू होना केवल जनहित मैं है बल्कि यह हमारे राष्ट्र और संविधान को सबल और सशक्त बनाने का मार्ग भी सुगम करेगा। रास्ता कठिन और कंटकमय ज़रूर है पर  दिशा सही नज़र रही है।
 
हेमन्त गोस्वामी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और कई गैर सरकारी संस्थानों से जुड़े हुए हैं आप हेमन्त से ई-मेल hemant@rightto.info पर संपर्क कर सकते है